Breaking News
uncategrized

महामारी कोरोना वायरस के सामने विश्व की महाशक्तियों का आत्मसमर्पण

अजित सिंह राठी 

एक कहानी में पढ़ा था कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है, कैसे होता है आज देख भी लिया। तमाम वो मुल्क़ जो अपनी सैन्य शक्ति और वैज्ञानिक प्रयोग के बल पर सुपर पावर बन गए, वो मुल्क़ जो दुनिया का सिकंदर बनने का ख़्वाब पूरा करने की फ़िराक़ में रहते हैं, आज अपने गुनाहों की सजा भुगत रहे हैं। अपनी कुछ गलतियों की वजह से प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए छुपते घूम रहे हैं। वो लोग जो अपनी ताक़त के अहंकार में चूर थे आज असहायों और लाचारी का जीवन बशर करने के लिए विवश है। खुद को शहंशाह समझ बैठे आज फ़रियाद लिए दरबदर है। एक ही झटके में चीन के वुहान शहर से निकले एक “कोरोना” ने दुनिया के सारे योद्धाओं के शौर्य को धूल चटाकर अपना शासन स्थापित कर दिया। दुनिया का दारोगा और महाशक्ति जैसे शब्दों से अलंकृत अमेरिका आज टकटकी लगाए आसमान की तरफ इस उम्मीद के साथ देख रहा है कि शायद कोई दैवीय शक्ति ऊपर से आये और राहत दे। जर्मन जैसे देश का वित्त मंत्री सुसाइड कर लेता है। दुनिया को आंख दिखने वाला चीन और बम बरसाने के लिए मशहूर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग तो जैसे किसी सख्त मिज़ाज़ हेड मास्टर की क्लास में अनुशासित बच्चों की तरह प्रारंभिक शिक्षा की किताब खोले बैठे हो। अब न कहीं सोमालिया के समुद्री लुटेरों द्वारा जहाजों को लूटने की खबर आती है और न ही इस समय किन्हीं दो देशों के बीच का सरहद विवाद का शोर सुनाई देता है। अब ना भारत में पाक समर्थित आतंकवादी घुसते हैं और न धारा 370 हटाने का विरोध है, एनआरसी और CAA भी अब कोई खास मुद्दा नहीं रहा। यहाँ ये सब बताना इसलिए जरुरी है कि इंसान खुद को जितना ताक़तवर समझ लेता है वो कोरे मुग़ालते के अलावा कुछ नहीं होता।

अजीबोगरीब दौर है। ऐसा लगता है कि दुनिया शून्य प्रहर से गुजर रही है। ताक़तवर लोग कोरोना के कहर से भूमिगत है, अजीब सी ख़ामोशी बिखरी पड़ी है, मंदिरो से आरती का संगीत और मस्जिदों से अज़ान की आवाज अब नहीं आती है। शिवालयों के मुख्य द्वार पर ताले लटके हैं। सूनी सड़कों पर सूखे पत्तों की सरसराहट और बेवक़्त की बूंदाबूंदी अपनी तरफ थोड़ा ध्यान तो खींचती है लेकिन यह सिलसिला बहुत देर तक नहीं चलता। सुनसान सड़कें, बाजार में दुकानों के बंद शटर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि संभल जाओ वर्ना जिंदगी जहन्नुम बनने में देर नहीं लगेगी। बेतहाशा भीड़, अनियंत्रित यातायात, व्यवस्था बनाने को दौड़ते पुलिकर्मी और उलझते लोग, मगर आज कुछ भी नहीं। महानगरों की सड़कों पर पसरे सन्नाटे को तोड़ती एम्बुलेंस और पुलिस वाहनों के सायरन भी अब थके थके से लगने लगे है। हर शहर की आँखों में डर और दहशत साफ़ झलक रही है। पूरी दुनिया एक ट्रॉमा में तब्दील हो गयी है। देहरादून में घंटाघर पर लगे घंटे की आवाज कभी पास से भी सुनी नहीं थी अब पांच सौ मीटर दूर सुनाई दे रही है। हर घंटे यह घडी बताती है कि तुम भले ही घर में कैद हो लेकिन मैं अपनी रफ़्तार से चल रही हूँ। शहर में पुलिस है, स्वास्थ्यकर्मी है, पत्रकार है और वीरान सड़कों पर इधर से उधर दौड़ते गलियों के वो आवारा कुत्ते हैं जिनका इंसान की करतूतों की वजह ने निकलना दूभर हो गया था। अच्छा हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को लॉक डाउन कर दिया और हम जनाजों के जलसे देखने से बच गए। देहरादून से हरिद्वार की तरफ निकलो तो नेशनल हाईवे पर बारह सिंघा जैसे वन्यजीव मस्ती के साथ विचरण कर रहे है। ऐसी चिड़ियाएं चहचहा रही है जो पहले नहीं देखी। दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक धारावाहिक शुरू हो गए हैं, लगता है हम खुद तीन दशक पीछे चले गए है और जिंदगी रिवर्स गियर में है।

                                                  US President Donald Trump

इस वक़्त बच्चों के दाखिले की प्रक्रिया से देश भर के स्कूल गुलजार रहते थे, एक महीने की क्लास चलने के साथ ही गर्मी की छुट्टियों में घूमने के लिए देश विदेश में मनपसंद शहर की बुकिंग का सिलसिला भी चल रहा होता, ट्रेवल एजेंसी खास प्लान बना रही होती और एयरलाइन्स नए सिरे से तैयारी कर रही होती, लेकिन गर्मी की छुटियों को तो भूल ही जाइये। सीज़न शुरू होने वाला है और देश दुनिया के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर होटल और रिसॉर्ट्स में ख़ामोशी पसरी है। उत्तराखंड में गढ़वाल की आर्थिक रीढ़ चार धाम यात्रा का क्या होगा किसी को खबर नहीं है। यात्रा के लिए बुक तक़रीबन दस हज़ार बसों की बुकिंग रदद हो चुकी है, अब कोरोना रहे या जाय यात्रा तो “गयी”। पहली बार कोरोना की दहशत के साये में चारों धाम के कपाट खोले जायेंगे वो भी बगैर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के। प्रकृति के इस गुस्से के प्रभाव बाद तक देखने को मिलेंगे। उत्तराखंड और बिहार के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में रिवर्स पलायन की शुरुआत हो चुकी है, हजारों लाखों लोग वापस लौट रहे हैं, अपने घर आना चाहते हैं भले ही भूखे रहे। जो कभी अपने पुश्तैनी घर की दहलीज़ पर त्योहारों में दिया जलाने तक नहीं आते थे उनके भीतर भी अपनी मिटटी के प्रति मोहब्बत उमड़ पड़ी है। ये मज़बूरी का ही सही लेकिन रिवर्स माइग्रेशन है। घर लौटने का आलम दिल्ली में देख लो, हजारों नहीं लाखों लोग बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश स्थित अपने पुश्तैनी घर के लिए पैदल ही निकल पड़े, कैसे जायेंगे सैंकड़ों किलोमीटर पैदल। लेकिन डर चीज ही ऐसी है साहब। डर के आगे जीत है, ये डायलॉग फिल्मों के लिए तो ठीक है लेकिन जब हालात बेक़ाबू हो तब बहुत बुरा लगता है। लोग बड़ी संख्या घर लौट रहे है, रिवर्स माइग्रेशन हो रहा है। जब ये दौर खत्म होगा तब कुछ लोग अपने काम के लिए फिर पलायन करेंगे और कुछ के कदम ठिठकेंगे जरूर। उनके लिए सम्बंधित राज्यों की सरकारों को स्वरोजगार का इंतज़ाम करना पड़ेगा। ख़ासतौर पर बिहार के लोग अब देर से लौटेंगे। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की इस मानव शक्ति को जो हेय दृष्टि से देखते थे, दुतकारते थे, उनमें से एक प्रतिशत भी ऐसे नहीं हैं जो अपना घर निर्माण करने के लिए खुद नींव में एक ईंट भी रख सकते हो। आर्थिक रूप से देश बहुत पीछे चला गया है, व्यापारिक, वाणिज्यिक संसथान बंद है, कारखानों की कल कल करती मशीनें शांत है, नौकरी व्यापर सब बंद है, टेक्स वसूलने वाले खली बैठे हैं, ऐसा लगता है सब कुछ ठहर गया है और इस ठहराव की बानगी तब दिखेगी कोरोना के बंद के दौरान का जीएसटी कलेक्शन आएगा।

                                                              Germany Chancellor

यदि यह दौर लम्बा चला तो जीएसटी के घटने, कई सालो तक रोजगार और नए व्यापर के अवसर कम होने की सम्भावना होगी।राज्यों को मिलने वाली सब्सिडी केंद्र बंद कर देगा, पोषित योजनाओ में 90:10 के अनुपात को उल्टा कर दिया जायेगा और सीमित संसाधन वाले राज्य इसका शिकार होंगे।  तमाम तरह के सन्देश सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं, लोग बता रहे है कि इस समय हमने क्या बचाया है। बड़ी मात्रा में पेट्रोल डीज़ल बचा लिया है, प्रकृति को स्पेस दिया है, फुर्सत में सो रहे है, परिवार के साथ समय बिता रहे है, बुरी आदतें सुधर रही है, महसूस कर रहे है कि जान है तो जहान हैं, शोरशराबा खत्म हो गया है, पेड़ पौधे समेत तमाम तरह की वनस्पति और पृथ्वी स्वस्थ हो रही है, प्रदूषण न्यूनतम स्तर पर है, अपराध और अपराधियों की जड़े उखड गयी है इत्यादि। इन बातों को सोचकर खुश हो रहे है और इन्हें बिगाड़ा भी इस आदमजात ने ही था। देश में मेडिकल इमरजेंसी लगी है, लाखों लोग सिस्टम की निगरानी में हैं, काफ़ी लोगो की डेथ हो चुकी है, मरने वाले मरते रहेंगे और कुछ उनकी गिनती करने का काम करते रहेंगे, जो योगदान दे सकते है वो बखूबी दे रहे है। वक़्त बहुत बुरा है, मुश्किल हालात है लेकिन इस दौर को सबक के रूप में लेना होगा अन्यथा प्रकृति ऐसे निर्णय लेती रहेगी। बस समय रुकता नहीं है चलता रहता है ये बात ही राहत देती है।

                                                                    Spain

लॉर्ड कृष्णा से अर्जुन ने पूछा कि भगवन एक ऐसी पंक्ति लिख दीजिये जो खुश हो वो दुखी हो जाय और जो दुःख में उसके चेहरे ख़ुशी की उम्मीद छा जाय,लॉर्ड कृष्णा ने लिखा “ये वक़्त भी गुजर जायेगा”इस पंक्ति को पढ़कर बहुत खुश व्यक्ति दुखी हो जाता है और बहुत दुखी प्राणी खुश हो जाता है। हम भी हिम्मत रखते है क्योंकि ये वक़्त भी गुजर जायेगा, लेकिन हमें बहुत कुछ सिखाकर जायेगा।

वरिष्ठ पत्रकार अजित सिंह राठी के ब्लॉग से साभार http://ajitrathi.com/blog/

vojnetwork@gmail.com

No.1 Hindi News Portal

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button