उपचुनाव की परीक्षा में पास हुए त्रिवेंद्र

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उपचुनाव की परीक्षा में पास हुए त्रिवेंद्र

भारतीय जनता पार्टी ने पिथौरागढ़ विधानसभा का उपचुनाव जीत कर अपनी सीट बरकरार रखने में कामयाबी हासिल की है। राज्य कैबिनेट के अहम सदस्य रहे, सौम्य एवं असरदार नेता प्रकाश पंत के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर उनकी पत्नी चंद्रा पंत ने कांग्रेस प्रत्याशी अजूं लुंठी को 3267 मतों से हरा दिया। चंद्रा पंत को 26086 और अंजू लुंठी को 22819 मत मिले। पिथौरागढ़ सीट पर बीते 25 नवंबर को मतदान हुआ था और 28 नवंबर को रिजल्ट घोषित हुआ। पिथौरागढ उपचुनाव जीतना भारतीय जनता पार्टी के लिए तो चुनौती थी ही साथ ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए भी यह उपचुनाव व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जुड़ा था, क्योंकि उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर उनके विरोधी लगातार उन पर निशाना साध रहे थे। मगर इस जीत के साथ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक बार फिर खुद को साबित कर दिखाया है। चुनाव परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने जिस तरह त्रिवेंद्र सरकार की तारीफ करते हुए इस जीत को सुशासन पर जनता की मुहर बताया, उसने भी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की परफारमेंस को पूरे नंबर दे दिए हैं।

बहरहाल इस जीत के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक बार फिर खुद को साबित कर दिखाया है। पिथौरागढ़ उपचुनाव में मिली जीत ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने वाले आलोचकों के मुंह पर ताला लगा दिया है।

पिथौरागढ उपचुनाव में मिली जीत भाजपा के लिए इस लिए भी अहम है क्योंकि विपक्षी कांग्रेस ने इस सीट को जीतने के लिए पूरा जोर लगाया हुआ था। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत समेत प्रदेश कांग्रेस के तमाम नेता कई दिनों तक पिथौरागढ़ में डेरा दाले रहे। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस सीट को जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली और जनता के बीच जाकर अपने कार्यकाल के आधार पर वोट देने की अपील की। चंद्रा पंत की जीत ने साबित कर दिया कि जनता त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल से संतुष्ट है।

18 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से अब तक के कार्यकाल की बात करें तो यह पहली बार नहीं है जब त्रिवेंद्र सिंह रावत ने खुद को साबित किया है। इससे पहले भी वे हर चुनावी इम्तिहान में खुद की नेतृत्व क्षमता साबित कर चुके हैं।

विधानसभा उपचुनाव की ही बात करें तो यह दूसरी बार है जब उनके नेतृत्व में भाजपा को जीत मिली है। इससे पहले 28 मई 2018 को हुए थराली विधानसभा के उपचुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी। तब तत्कालीन भाजपा विधायक मगन लाल शाह के निधन के बाद खाली हुई सीट पर उनकी पत्नी मुन्नी देवी शाह ने जीत दर्ज की थी। तब भी भाजपा के सामने चुनाव जीतने की बड़ी चुनौती थी। कांग्रेस पार्टी ने पूर्व विधायक डाक्टर जीत राम को मैदान में उतारा था जो मुन्नी देवी शाह के मुकाबले मजबूत प्रत्याशी बताए जा रहे थे। तब भी कांग्रेस ने विधानसभा उपचुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं ने कई दिनों तक थराली विधानसभा में प्रचार किया। मगर अंत में बाजी भाजपा के हाथ लगी। थराली विधानसभा के उपचुनाव को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के एक वर्ष के कार्यकाल की परीक्षा माना गया था, जिसे पास करने में वे सफल रहे। थराली विधानसभा उपचुनाव के छह महीने बाद नवंबर 2018 में फिर से त्रिवेंद्र सरकार का इम्तिहान हुआ, जब प्रदेश में निकाय चुनाव की घोषणा हुई। विपक्ष ने एक बार फिर त्रिवेंद्र सरकार को नाकारा बताने की पुरजोर कोशिश करते हुए प्रदेशभर में प्रचार किया। लेकिन सात में से पांच नगर निगमों में भाजपा को जीत दिला कर जनता ने फिर से त्रिवेंद्र सिंह रावत की परफारमेंस पर मुहर लगा दी। इस जीत के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत का कद और बड़ा हो गया। निकाय चुनाव से कुछ दिन पहले तक भाजपा में उनके खिलाफ दबी आवाज में ही सही लेकिन असंतोष के जो स्वर सुनाई देते थे, वे ठंडे पड़ गए और त्रिवेंद्र निष्कंटक होकर सरकार चलाने लगे।

इसके बाद मार्च में लोकसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही एक बार फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत की परीक्षा का वक्त आ गया। हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से देशभर की तरह उत्तराखंड में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही मुख्य चेहरा रहे और पार्टी ने उन्हीं के नाम पर चुनाव लड़ा, मगर इसके बावजूद  चुनाव को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा से भी जोड़ कर देखा जा रहा था। लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के हर कोने पहुंच कर पांचों संसदीय सीटों पर प्रचार किया। प्रचार के दौरान उन्होंने अपने सवा दो वर्ष के कार्यकाल का लेखा जोखा भी जनता के सामने रखा। इतना ही नहीं उत्तराखंड में चुनाव निपटने के बाद वे दूसरे प्रदेशों में भी जाकर चुनाव प्रचार किया। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने पांचों सीटें भाजपा की झोली में डाली और त्रिवेंद्र पहले से ज्यादा मजबूत हो गए।

पिथौरागढ़ उपचुनाव से कुछ दिन पहले प्रदेश में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि कुछ दिन पहले रुड़की नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी की हार ने जरूर त्रिवेंद्र सरकार को असहज किया, मगर राजनीतिक पंडितों की मानें तो अभी तक के हर बड़े चुनाव में भाजपा को मिल रही जीत से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कद लगातार बढ़ रहा है।

शांत छवि के माने जाने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत अपनी क्षमताओं का प्रमाण वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी दे चुके हैं। मौजूदा गृह मंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तब उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे अमित शाह के साथ सह प्रभारी के रूप में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तर प्रदेश की 80 संसदीय सीटों पर चुनावी रणनीति बनने में अहम योगदान दिया था। 80 में से 73 सीटें जीत कर तब भाजपा ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत को भाजपा ने झारखंड का प्रदेश प्रभारी बना कर भेजा और झारखंड में भाजपा के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। यूपी लोकसभा चुनाव और झारखंड विधानसभा चुनाव में शानदार परफारमेंस के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के और करीबी हो गए और यहीं से उनके उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने की राह प्रशस्त हुई। बहरहाल आरएसएस के खांटी कार्यकर्ता रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत लगातार अपनी नेतृत्व क्षमता साबित करते जा रहे हैं। इस बार के चुनाव परिणामों ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को मजबूत और असरदार जननेता के रूप में एक बार फिर मान्यता दे दी है।