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उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में गन्ना बकाया दस हज़ार करोड़ के पार

चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह, अध्यक्ष, किसान शक्ति संघ

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गन्ना मूल्य लगातार दूसरे साल भी ना बढ़ाने के कारण गन्ना किसानों में पहले ही भारी नाराज़गी है। अब इस सीजन के चार महीने बीतने के बाद किसानों के गन्ना भुगतान की बकाया राशि भी बढ़कर दस हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। इस दोहरे अन्याय से गन्ना किसानों में भीतर ही भीतर भारी रोष पनप रहा है। यदि इसपर ध्यान नहीं दिया गया तो यह कभी भी फट कर बाहर सकता है और योगी सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद अब तक के तीन चीनी वर्षों में केवल 2017-18 में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी जो नाकाफी है। उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी (राज्य परामर्शित मूल्य) पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। इस साल गन्ना किसानों को सरकार से गन्ने का भाव बढ़ने की बड़ी उम्मीद थी परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जबकि पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनीभंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल बदल गई है जिस कारण सभी आर्थिक तर्क भी भाव बढ़ाने के पक्ष में थे। इस साल गन्ना मूल्य ना बढ़ने, देश में कम चीनी उत्पादन होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो पूरी राहत मिलेगीपरन्तु गन्ने के रेट ना बढ़ने से गन्ना किसानों की स्थिति और बिगड़ेगी।

2018-19 में देश में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष 2019-20 में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। अतः हमारी लगभग सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए थे। इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्षके 332 लाख टन के मुकाबले घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो केवल घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। चालू गन्ना पेराई सत्र की पहले चार महीनोंअक्टूबर 2019 से जनवरी 2020 के बीच देश में चीनी का उत्पादन पिछले साल की इस अवधि के मुकाबले 24 प्रतिशत घटकर 141 लाख टन रह गया है। पिछले साल इस अवधि में देश में चीनी का उत्पादन 186 लाख टन था।

2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने काअनुमान है। इस कारण इस वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी जिसकी आपूर्ति भारत कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनीभंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादालाभ होगा क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा, जहाँ 120 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है।

2018-19 में उत्तर प्रदेश के किसानों ने 33,048 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु 1 फरवरी 2020 तक इसमें से 961 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है। चालू पेराई सत्र में चार महीने बीतने के बाद भी 1 फरवरी 2020 तक इस सीज़न का केवल लगभग 7600 करोड़ रुपये का ही गन्ना भुगतान हुआ है, जबकि किसान लगभग 16,600 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके हैं अतः चालू सीजन का ही गन्ना भुगतान का बकाया लगभग 9,000 करोड़ रुपये हो चुका है। इस तरह 1 फरवरी 2020 तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान बकाया है। इसके अलावा विलम्बित भुगतान के लिए देय ब्याज़ का आंकड़ा भी 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है।

इस साल गन्ना मूल्य निर्धारण से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी।किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं जबकि लागत काफी बढ़ गई है। गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर के अनुसार गन्ने की औसत उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल  रही है। सरकार के लागत के डेढ़ गुना मूल्य देने के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए था। यदि पिछले तीन सालों में 10 प्रतिशत की मामूली दर से भी वृद्धिकी जाती तो भी इस वर्ष 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव अपने आप हो जाता।

वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सहउत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सहउत्पादों से एथनॉल, बायोफर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रणआदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनोंके अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें सालसाल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह चीनी मिलें अपने बैंकों के ब्याज के खर्चे की बचतभी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को चीनी बफर स्टॉक, एथनॉल क्षमता बनाने और बढ़ाने, चीनी निर्यात के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए हैं। इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया और ही सरकार ने गन्ने का भाव बढ़ाया।

हर साल होने वाली गन्ना भुगतान और किसानों को गन्ने का अच्छा मूल्य ना मिलने की समस्या से निपटने के लिए हमें चीनी उद्योग के विषय में एक अलगनीति बनाने पर भी विचार करना होगा। देश में चीनी का 75 प्रतिशत उपयोग व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा किया जाता है जिसमें चॉकलेटपेयपदार्थच्यवनप्राश, जूस, मिठाई, आइसक्रीम, बिस्किट, हेल्थ ड्रिंक्स आदि निर्माता शामिल हैं। इन पेयखाद्य पदार्थों में 70 प्रतिशत तक चीनी ही होती है जिसे अत्यधिक मंहगे दामों पर उपभोक्ताओं को बेचा जाता है। यदि व्यावसायिक इस्तेमाल होने वाली चीनी का रेट घरेलू से ज्यादा तय कर दिया जाए तोचीनी मिलों और गन्ना किसानों दोनों की समस्या का हल हो सकता है। दुनिया में अनेक देश स्वास्थ्य कारणों से, अत्यधिक चीनी इस्तेमाल को रोकने केलिएशुगर टैक्सभी लगाते हैं। दूसरे, ब्राज़ील की तरह हमें भी गन्ने का प्रयोग बाज़ार की मांग के अनुसार चीनी, एथनॉल या अन्य उत्पादों को बनाने में नियंत्रित रूप से करना चाहिए। इससे एक तो अत्यधिक चीनी उत्पादन और उससे होने वाली अनेक समस्याओं से बचा जा सकता है और दूसरा एथनॉल का प्रयोग पेट्रोल में मिलाकर पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को भी कुछ बचाया जा सकता है। इससे वायु प्रदूषण भी कुछ कमहोगा क्योंकि एथनॉल ग्रीन फ्यूल है। 

ये दोनों कदम देश, सरकार, किसान, उपभोक्ता और चीनी उद्योग के हित में हैं। अधिक उत्पादन को देखते हुए पिछले दो सालों से गन्ने के दाम नहीं बढ़ाया गया। महंगाई दर के प्रभाव और बढ़ती लागत के कारण गन्ने का वास्तविक दाम घट गया है। बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार को लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए था। परन्तु इस स्थिति का सारा लाभ अब चीनी मिलें ही उठाएंगी और किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ नहीं लगेगा। सरकार अब भी अलग से बोनस देकर गन्ना किसानों को बदहाली से बचा सकती है। गन्ना मूल्य बहुत हो संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है जिससे करोडों लोगों की जीविका जुड़ी हुई है। सरकार ने तत्काल प्रभाव से पहल नहीं की तो बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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