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उत्तर प्रदेश

जुनून, जज्बा और जांबाजी की जिंदा मिसाल हैं शूटर दादियां

 

सत्यजीत पंवार 

        जुनून, जज्बा और जांबाजी की जिंदा मिसाल दो चैंपियन दादियां (CHAMPION DADI)  एक बार फिर से चर्चा में हैं। वही चैंपियन दादियां जिन्हें पूरी दुनिया ‘शूटर दादी’ (SHOOTER DADI) के नाम से जानती हैं। चंद्रो तोमर और प्रकाशो तोमर (PRAKASHI TOMAR)। उत्तर प्रदेश (UTTAR PRADESH) के किसान बाहुल्य बागपत जिले (BAGPAT) के जोहड़ी गांव (Johri’s shooting stars) की इन दो दादियों के जीवन पर बनी वालीवुड फिल्म ‘सांड की आंख’ (SAND KI AANKH PEDNEKAR) इस दिवाली को देशभर में रिलीज हो रही है। फिल्म में अभिनेत्री भूमि पेडनेकर (BHUMI चंद्रो तोमर और तापसू पन्नू (PAPSEE PANNU) प्रकाशो तोमर की भूमिका में हैं। फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप (ANURAG KASHYAP) हैं और इसका निर्देशन किया है तुषार हीरानंदानी (TUSHAR HEERANANDANI) ने। फिल्म के ट्रेलर को जिस तरह दर्शकों ने सराहा है उससे साफ है कि ये सुपर हिट (SUPER HIT FILM) रहेगी। खैर, ये तो हुई फिल्म की बात, अब असल बात पर आते हैं।

असल बात ये है कि जीवन के अस्सी बसंत पूरे कर चुकी इन दो दादियों में आखिर ऐसा क्या है कि करोड़ों रुपये खर्च कर इनके जीवन पर फिल्म बन गई ? इसका जवाब है इन दो दादियों की अभूतपूर्व उपलब्धियां।

साठ बरस की उम्र पार करने के बाद जब कोई भी इंसान अपना बाकी जीवन आरामदायक तरीके से जीने लगता है, जब कोई भी इंसान कुछ नया करने के बजाय पुरानी स्मृतियों के साथ ही आगे का जीवन गुजारता है तब एक साधारण से गांव की इन दो दादियों ने ऐसा असाधारण कारनामा कर दिखाया जिसने इन्हें पूरी दुनिया में शूटर दादी के नाम से मशहूर कर दिया। साठ बरस की उम्र में इन दो दादियों को निशानेबाजी का ऐसा जुनून चढ़ा कि इन्होंने इस खेल के मायने ही बदल दिए। निशानेबाजी के जिस खेल में पुरुषवादी वर्चस्व प्रभावी रहता था, उसमें महिलाओं का डंका बजने लगा। सन 1999 में अचानक शुरू हुआ चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर का यह सफर किसी परीकथा जैसा है।

कहानी कुछ इस तरह है कि जोहरी गांव में एक शूटिंग रेंज खुली जिसमें इलाके के लड़के निशानेबाजी सीखने जाने लगे। चंद्रो तोमर की पोती शेफाली का मन भी निशानेबाजी सीखने का हुआ मगर उसके सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि शूटिंग रेंज में केवल लड़के ही निशानेबाजी सीखने जाते थे। ऐसे में दादी चंद्रो एक दिन अपनी पोती के साथ शूचिंग रेंज चली गई और कोच फारूक पठान से कहा कि उनकी पोती को भी शाना लगाना सीखना है।

कोच ने शेफाली को एक पिस्टल दिया और निशाना साधने को कहा। घबराहट के चलते बार-बार कोशिश करने के बावजूद शेफाली निशाना नहीं लगा पा रही थी। शैफाली का हौसला बढाने के लिए दादी चंद्रो ने पिस्टल अपने हाथ में उठाया और एक ही बार में सांड की आंख यानी ‘बुल्ल आई’ पर निशाना साध दिया।  (निशानेबाजी के खेल में टारगेट को बुल्ल आई (BULL EYE) कहते हैं।)

चंद्रो तोमर का निशाना देखकर कोच फारूक पठान और सारे लड़के हैरान रह गए। किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि साठ साल की एक ग्रामीण महिला इतना शानदार निशाना लगा सकती है। मगर दादी ने ऐसा कर दिखाया था। दादी के इस करतब को देख कर कोच फारूक पठान ने उनसे कहा कि वे भी अपनी पोती से साथ शानेबाजी की ट्रेंनिग लेँ। कुछ दिन बाद चंद्रो तोमर के साथ प्रकाशी तोमर भी शूटिंग रेंज पहुंच गई। इसके बाद सब इतिहास है।

चंद्रो तोमर और प्रकाशो तोमर ने जोहड़ी गांव की इस शूटिंग रेंज से बाहर निकल कर इसके बाद एक से एक उपलब्धियां अर्जित की। दोनो ने 1999 से लेकर 2016 के बीच निशानेबाजी की प्रतियोगिताओं में सैकड़ों मेडल हासिल किए। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में दोनो ने 25 नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप (NATIONAL SHOOTING CHAMPIONSHIP) जीती हैं।

दोनों दादियों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर (INTERNATIONAL SHOOTING CHAMPIONSHIP) की प्रतियोगिताओं में कई मेडल जीते हैं। इनमें 2001 में वाराणसी में 24वीं उत्त प्रदेश राज्य निशानेबाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक, 2001 में अहमदाबाद में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक, 2001 में तमिलनाडु में में स्वर्ण, 2001 में चंडीगढ़ में एयर पिस्टल, 25 मीटर में रजत पदक, 2002 में दिल्ली में नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक, कोयंबटूर और चेन्नई में रजत पदक शामिल हैं। इसके अलावा दोनो के नाम कई और भी रिकार्ड दर्ज हैं। दोनो दादियों को उनकी अभूतपूर्व उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है। आज न केवल जोहड़ी गांव और बागपत जिला बल्कि पूरा देश चंद्रो तोमर और प्रकाशो तोमर की उपलब्धियों पर गर्व करता है।

मगर इस शानदार कहानी के पीछे बेहद कठिन संघर्ष भी छिपा है। चंद्रो तोमर और प्रकाशो तोमर इस मुकाम हासिल करने के लिए एक नहीं बल्कि कई-कई चुनौतियों से जूझी हैं। दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती था उनका महिला होना, और वह भी ठेठ गांव की महिला।

हमारे देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी महिलाओं की स्थिति पुरुषों के मुकाबले बेहद कमजोर है। आज से दे दशक पहले की स्थिति तो आज से भी कठिन थी। तब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना असंभव सा था। ऐसे में चंद्रौ तोमर और प्रकाशी तोमर न केवल घर से बाहर निकलीं बल्कि उन्होंने दुस्साहस दिखाते हुए ऐसे खेल को चुनौती को रूप में लिया जिसमें हमेशा से पुरुषों का बर्चस्व रहता आया है। अपनी कहानी सुनाते हुए चंद्रो तोमर बताती हैं कि, ‘हम कभी घर से बाहर निकल कर इस खेल के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, मगर एक बार जब मौका मिला तो फिर हमने ठान लिया कि अब चाहे हो भी अंजाम हो निशानेबाजी कीख कर रहेंगे।’ वे आगे कहती हैं, ‘मैं छुप कर निशानेबाजी रेंज जाती थी, वहां मैने सबको बताया था कि मेरे घर वालों को इस बारे में कोई खबर नहीं होनी चाहिए। शूटिंग रेंज से निकलने के बाद मैं खेतों में और गौशाला में छुप कर अभ्यास करती थी। हमेशा पकड़े जाने का डर लगा रहता था, मगर इसी डर के साथ जीते हुए मैने अपना अभ्यास जारी कखा। बाद में प्रकाशी भी मेरे साथ निशानेबाजी करने लगी और हम एक से दो हो गए।’

प्रकाशो तोमर की सफलता भी इसी तरह के संघर्ष की बानगी है। वेहती हैं, ‘ महिलाओं को हमारे समाज में बाहर जाने की इजाजत नहीं थी, उन पर कई तरह का पहरा होता था, हमने इन पहरों के दायरे में रहते हुए इस खेल को सीखा।’ प्रकाशो तोमर भी पहली बार जोहड़ी शूटिंग रैंज में अपनी बेटी सीमा तोमर को लेकर गई थीं। इसी दौरान एक दिन उन्होंने भी पिस्टल हाथ में उठाया और टारगेट भेद दिया। प्रकाशो तोमर की बेटी सीमा तोमर आज देश की ख्यातिप्राप्त निशानेबाज हैं। सीमा तोमर 2010 में वर्ल्ड कप प्रतियोगिता में रायफल और पिस्टल वर्ग में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी। वहीं शेफाली भी अलग-अलग प्रतियोगिताओं में मेडल जीत कर इंटरनेशलन शूटर का दर्जा पा चुकी हैं। इन दोनो के अलावा शूटर दादियों के परिवार में कई बच्चे निशानेबाजी के कैरियर बना रहे हैं। आसपास के इलाकों के बच्चें में भी शूटिंग के प्रति क्रेज बढ़ता जा रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यह शूटर दादियों की उपलब्धियों की बदौलत ही है।

  मीडिया को दिए अपने तमाम इटरव्यू में दोनो दादियों ने अपनी ट्रेनिंग को लेकर मजेदार किस्से बताए हैं। एक इंटरव्यू में दोनो ने बताया रात में जब घर के सभी लोग सो जाते थे तब वे पानी से भरा जग हाथ में लेकर घंटों तक खड़ी रहतीं थी। ऐसा वे पिस्तौल पकड़ने के अभ्यास के लिए किया करती थीं। दोनों दादियों ने जब पहली बार शूटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया तो उनका खूब मजाक बनाया गया। उन्हें तरह-तरह के ताने सुनने पड़े। उन्हें दुत्कार दी गई कि निशानेबाजी मर्दों का खेल है। एक इंटरव्यू में दादियों ने बताया कि उन्हें गांववाले ताने दिया करते थे कि, क्या इस उम्र में वे कारगिल जाएंगी?  मगर अपने प्रदर्शन से दोने दादियों ने धीरे-धीरे सबके मुंह बंद करा दिए। आज जोहड़ी गांव का हर हर इंसान शूटर दादियों का दिल से सम्मान करता है और खुद को जोहड़ी गांव का निवासी होने पर गर्व महसूस करता है। जीवन के अस्सी बसंत पार कर चुकी दोनों दादियां आज भी उसी जुनून के साथ निशानेबाजी करती हैं। अब भले ही दोनों ने प्रतियोगिताओं मे भाग लेना बंद कर दिया है मगर इसके बाव भी दोनों नियमित रूप से शूटिंग का अभ्यास करती रहती हैं। शूटिंग रैंज जाकर नए खिलाडियों को गुर सिखाना और हौसला देना दोनों की जीवनचर्या का अभिन्न हिस्सा है। ‘बेटी बचाओ, बेटी खिलाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे को साकार करते हुए दोनों इलाके की तमाम बेटियों को अपनी तकदीर खुद लिखने की प्रेरणा देती हैं। खुद के जीवन पर फिल्म बनने के बाद से दोनों दादियां एक बार फिर से दुनियाभर में चर्चा में हैं। अपने जीवन पर बनने वाली फिल्म के बारे में दोनों दादियों की खुशी छुपाए नहीं छुपती हैं। आखिर खुशी हो भी क्यों न, जिनका आधा जीवन घूंघट के साथ बीत गया आज उन्हें सिनेमा के पर्दे पर देखने के लिए करोड़ों लोग उत्साहित हैं।

कुल मिलाकर चंद्रो तोमर और प्रकाशो तोमर की यह कहानी इसलिए भी प्रेरक है क्योंकि दोनों ने पुरुषवादी समाज की तमाम मान्यताओं, वर्जनाओं और कुरीतियों को तोड़ते हुए महिलाओं के लिए सम्मानजनक मुकाम स्थापित किया है।

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