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कभी पराली हमारी दोस्त थी…….

आज भले ही पराली दुश्मन नज़र आ रही हो किंतु बचपन में पराली हमारे अच्छे मित्रों में शामिल थी। गेहूँ से बचा शेष भाग तो भुस (भुसा) बन जाता है किंतु धान का शेष भाग पराली के रूप में बचता है। पहले कभी पराली को बांधकर गांव लाया जाता और घरों के बाहर दीवारों से लगाकर रख दिया जाता। जिसके यहां घेर होता वहां पराली रख दी जाती। हम बच्चों के लिए यह समय पराली के साथ नए खेल खेलने का होता था। हम छतों पर चढ़कर पराली पर कूदा करते थे, हम दुःसाहसी बालक ऊँचे से कूदने पर भी आश्वस्त रहते कि विनम्र पराली की गोद में कूदकर हम सुरक्षित रहेंगे। पूलो के रूप में (गट्टर) बंधी पराली का हम घर और सुरंग बनाया करते थे। पराली के साथ हमारी धमा-चौकड़ी तब तक चलती जब तक सर्दी नहीं बढ़ जाती या पराली पशुओं का चारा नहीं बन जाती। उस समय पराली खेतों में नहीं जलाई जाती थी, पशुओं का चारा होती थी। पशुओं का गद्दा भी पराली का ही बनाया जाता था। अधिक सर्दियों में पशु प्रेमी किशोर ठिठुरते पिल्लों का घर भी पराली से बना दिया करते थे। लेकिन अब पशु पराली खाना नहीं चाहते क्योंकि धान में भरपूर कीटनाशक गिराए जाने के कारण पराली अब पशुओं के खाने लायक नहीं रही। किसानों का भी मोह अधिक उपज से है भले ही पराली जहरीली हो। जिस जहरीली पराली को पशु भी खाना पसंद नहीं कर रहे, उसे जलाने पर कैसा जहर निकलेगा ? कल्पना कीजिए। हमारे बचपन की पराली को दूषित किसने किया ? कीटनाशक कहां से आ रहे हैं ? शायद ! दिल्ली से। फिर हवा में घुलकर कीटनाशक अपने घर ही तो जा रहे हैं। लेकिन ये खेतों तक क्यों आ रहे हैं ? खेतों में कितनी मात्रा में डाले जा रहे हैं ? मिट्टी उर्वरा क्षमता क्यों खो रही है ? जैविक खाद कहां है ? कृषि वैज्ञानिक कहां हैं ? कृषि विज्ञान केंद्र क्या कर रहे हैं ? कृषि विश्वविद्यालय कहां हैं ? विडम्बना ! काम कहां होना चाहिए और हो रहा कहीं और… दोष बेचारी केवल पराली का। मुझे पीड़ा है बचपन के एक निर्दोष साथी पर चारों ओर से हो रहे प्रहारों को देखकर……. ( राजीव उपाध्याय यायावर के फेसबुक से साभार )

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