Breaking News
अन्य

दिल की बिमारियों से जुडी कुछ नई तकनीकें

डॉ.सुभाष मनचंदा ( सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट ) सरगंगा राम अस्पताल

5-7 साल पहले तक जिन दिल की बिमारियों का ईलाज सर्जरी के माध्यम से किया जाता था उन्हें अब दवाइयों व अन्य तकनीकियों से किया जा रहा है। सर्जरी की जरुरत भी पड़ती है तो माइनर सर्जरी करके बिमारी का समाधान ढूंढा जा रहा है। वर्तमान में कई ऐसे नये उपचार शुरू हुए हैं जिनकी मदद से बिना सर्जरी के कई हार्ट बिमारियों का ट्रीटमेंट संभव है। ऐसे ही कुछ उपचारों के बारे में जानकारी दे रहा है यह आलेख-

बटन डिवाइस से किया जा रहा है दिल के छेद का ईलाज

पहले दिल में छेद हो जाने की समस्या को काफी गंभीर रुप से देखा जाता था। क्योंकि यह दिल के अंदर लोअर चैंबर में मौजूद वाल पर होता है, छेद का साइज बड़ा हो तो दिल सही प्रकार से ऑक्सीजन युक्त ब्लड की सप्लाई शरीर तक नही कर पाता, कई बार तो यह ऑक्सीजन युक्त ब्लड को वापस फेफड़ों में पहुंचा देता है। इसे साइंटिफिक भाषा में वेंट्रीक्यूलर सेप्टल डिफेक्ट कहते हैँ। इसके लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प था। लेकिन अब दिल में हुए छेद का ट्रीटमेंट बिना सर्जरी भी संभव है। इस नई तकनीक में शर्ट के बटन जितनी डिवाइस को पैर की नस में कैथेटर ट्यूब डालकर दिल तक पहुंचाकर दिल के छेद को प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। बटन डिवाइस से दिल में हुए छेद को प्रत्यारोपित करने में एक घंटे का ही समय लगता है। इस प्रक्रिया की सबसे बडी खास बात यह है कि मरीज की रिकवरी भी सप्ताहभर के अंदर हो जाती है। ऑपरेशन के बाद मरीज को 48 घंटे चिकित्सकों की निगरानी में रखकर अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है।

बाइपास सर्जरी हुई बीते जमाने की बात

ह्दय की नलियों में रुकावट आ जाने की वजह से ह्दय अपना कार्य ठीक प्रकार से नही कर पाता। कई बार ह्दय में एक से अधिक ब्लॉक भी हो जाते है। नतीजन पीड़ित व्यक्ति को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके लिए बाइपास सर्जरी की जाती थी। बाइपास सर्जरी में छाती में एक दस इंच का कट लगाकर ब्लॉक हुई नसों को हटाया जाता है और उनकी जगह दूसरी नसों को प्रत्यारोपित किया जाता है। लेकिन अब क्रोनिक टोटल ओकुलुशन तकनीक के आ जाने के बाद यह सर्जरी बीते जमाने की बात हो चुकी है। इस तकनीक में हाथ की कलई के पास एक छोटा का कट लगाकर रक्त नलियों के माध्यम से एक तार ह्दय तक पहुंचाया जाता है जहां पर नसें ब्लॉक है।.इस तार के अंतिम छोर पर एक बैलून लगा होता है, ह्दय में ब्लॉक स्थान पर ले जाकर इसे खोल दिया जाता है, इससे नसों का ब्लॉक खत्म हो जाता है। इसके बाद उस स्थान पर एक स्टैंट डाल दिया जाता है।

वाल्व रिप्लेसमेंट के लिए टीएवीआर तकनीक

ह्दय के अंदर चार वाल्व होते हैं जिन्हें मिटरल वाल्व, ट्रीक्यूस्पिड वाल्व, एओर्टिक वाल्व और प्लमोनरी वाल्व कहते हैं। ये वाल्व खून के प्रवाह को रोकने का कार्य करते हैँ। सबसे ज्यादा समस्या एओर्टिक वाल्व में आती है क्योंकि यह वाल्व रक्त को एक दिशा में प्रवाहित करता है। एओर्टिक वाल्व में कई बार समस्या जन्मजात होती है तो कई बार वाल्व में कैल्शियम के जम जाने के कारण वाल्व सिकुड़ने लगते है। परिणामस्वरुप वाल्व ठीक प्रकार से कार्य नही कर पाते। इस बिमारी को साइंटिफिक भाषा में एओर्टिक स्टेनोसिस कहते हैं। इसके ट्रीटमेंट के लिए अभी तक ओपन हार्ट सर्जरी की जाती थी जिसमें मरीज को बाइपास पम्प पर रखा जाता था और दिल को खोलकर सर्जरी की जाती थी। यह काफी तकलीफदेह थी। लेकिन अब नई तकनीक से वाल्व बदलने के लिए चिकित्सकों को मात्र दो घंटे का समय लगता है। यह तकनीक है ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट। इस तकनीक के द्वारा ईलाज करने के दौरान मरीज को एक हल्का सा कट लगाया जाता है। यह कट पैर या छाती में लगाया जा सकता है। यदि वाल्व को रिपेयर करना है तो सेक्शन ट्यूब की मदद से बैलून को वाल्व तक पैर में कट लगाकर भेजा जाता है। वाल्व में बैलून को खोल दिया जाता है जिससे वाल्व में जमा कैल्शियम हट जाता है। यदि वाल्व पूरा खराब होता है छाती में हल्का कट लगाकर आर्टिफिशियल वाल्व प्रत्यारोपित किया जाता है। इस तकनीक से ट्रीटमेंट करने में मात्र दो घंटे का समय लगता है।

बायो स्टैंट भी है मौजूद

आजकल बॉयो स्टैंट को चिकित्सक काफी तरजीह दे रहे हैं। दरअसल, दिल की धमनियों में कोलेस्ट्रॉल जम जाने की वजह से वह ब्लॉक हो जाती है, कई बार धमनियां सिकुड जाती है। जिससे रक्त का संचार ठीक प्रकार से धमनियों से नही हो पाता। इस समस्या के बढ़ने पर मरीज को दिल का दौरा पड़ना, धडकन बढ़ जाना जैसी समस्या भी बढने लगती है। कोलेस्ट्रॉल को हटाने और धमनियों को खोलने के लिए इनमें स्टैंट डाला जाता है। आजकल बॉयएब्जॉर्बेबल स्टेंट सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे हैँ और इनके नतीजे भी आम स्टैंट के मुकाबले काफी बेहतर आ रहे है। नार्मल स्टैंट स्टेनलेस स्टील के बने होते हैं और यह ताउम्र धमनियों में ही पड़े रहते हैँ। कई बार साइड इफेक्ट भी नजर आते हैँ, स्टैंट लगाने के बाद मरीज को ब्लड थिनर दवाइयों का सेवन करना पड़ता है। लेकिन बॉयएब्जॉर्बेबल स्टैंट प्लास्टिक धातु के बने होते हैं और यह दो से ढाई साल के अंदर अपने आप घुल कर समाप्त हो जाते हैँ।

प्रस्तुति-कुलदीप तोमर

vojnetwork@gmail.com

No.1 Hindi News Portal

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button