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पूर्व फौजी ने गांव में कर दिखाया कमाल, सबके लिए बने नजीर

खबर टिहरी के चंबा से है जहां एक रिटायर्ड फौजी ने सबके लिए नजीर पैदा कर दी। इस पूर्व फौजी ने गांव में वो काम कर दिखाया जो सबके लिए एक मिसाल है।  रिटायर होने के बाद इस फौजी ने गांव की बंजर जमीन को उपजाऊ बनाया और आज लाखों की नगदी फसलें उगा रहा है।

पर्वतीय क्षेत्रों में जो लोग खेती-किसानी को घाटे का सौदा बता रहे हैं उनको आइना दिखाने का काम पूर्व सैनिक देव सिंह पुंडीर कर रहे हैं। वे आज असिंचित खेती में लाखों की नगदी फसलें उगा रहे हैं। यही नहीं खेती से आज उनकी अच्छी खासी आमदनी भी हो रही है।

सिलकोटी गांव के रहने वाले 60 वर्षीय पूर्व सैनिक देव सिंह पुंडीर आज खेती से जुड़ने वालों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। वे पंद्रह साल पूर्व जब आर्मी से सेवानिवृत्त हुए तो एक साल तक खाली ही रहे। पूर्व सैनिकों को दूसरी नौकरी आसानी से मिल जाती है, लेकिन उसके बाद उन्होंने कोई दूसरा काम करने के बजाए नगदी फसलें उगाने का निर्णय लिया और फिर खेती करने में जुट गए।

शुरूआत में यह आसान न था ना ही सिचाई के लिए पानी की व्यवस्था और न खेती करने का पर्याप्त अनुभव व ज्ञान। गांव के बड़े बुजुर्गों से खेती का अनुभव लिया और कृषि एवं उद्यान विभाग से तकनीकी जानकारी प्राप्त की। उनकी मेहनत का नतीजा यह निकला कि आज वह प्रति सीजन एक लाख से डेढ़ लाख रुपये की सब्जियां बेच रहे हैं। सिंचाई के लिए बरसाती पानी का संग्रह किया फिर उसे फसलों की सिंचाई के उपयोग में लाए।

जब उनसे पूछा गया कि फौज से सेवानिवृत्त होने के बाद खेती करने का निर्णय क्यों लिया। तो उन्होंने बताया कि काफी समय बाद उन्हें आभास हुआ कि ग्रामीण जन-जीवन में खेती जीवन का मूल आधार है। यदि पलायन रोकना है तो खुद ही पहल करनी होगी। वह अन्य लोगों को भी आधुनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

देव सिंह पुंडीर करीब चालीस नाली असिचित भूमि में नगदी फसलें उगा रहे हैं। जिनमें आलू, बीन, मटर, गोभी, राई, मूली, खीरा, बैंगन, कद्दू, टमाटर, लौकी, लहसून, अदरक, हल्दी आदि नगदी फसलें प्रमुख हैं। खास बात यह है कि वे जैविक तौर-तरीकों से सब्जी का उत्पादन करते हैं। वे रासायनिक खाद व दवा का प्रयोग नही करते हैं। उनके दो बेटे हैं जो घर से बाहर नौकरी करते हैं।

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