Breaking News
uncategrized

मुख्यमंत्रियों से मुँह फेरती ‘जीत’

अजित सिंह राठी की कलम से 

यदि आप थोड़ी भी राजनीतिक समझ रखते हैं तो उत्तराखंड और झारखण्ड में समानताओं का आंकलन करना  जटिल काम नहीं है। मसलन, दोनों राज्यों का एक ही दिन गठन होना, गठन के बाद लम्बे समय तक राजनीतिक अस्थिरता के चक्रव्यूह में फंसे रहना, नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की अत्यधिक रफ़्तार होना और कई मुख्यमंत्रियों का चुनाव में हार जाना। राजनीतिक तिगड़मबाजी का आलम यह रहा कि गठन के बाद से अब तक उत्तराखंड को नौ और झारखण्ड को छह मुख्यमंत्री मिल चुके हैं। यह काफी चिंताजनक था कि जो मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल में तमाम कीर्तिमान स्थापित करने का दावा ठोकते रहे, जनता उन्हें ठुकराती रही। झारखण्ड के मौजूदा मुख्यमंत्री रघुबर दास की हार के बाद दोनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों की हार की कहानी फिर सामने आ गयी है।

उत्तराखंड : 

उत्तराखंड में जब वर्ष 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ तो प्रदेश के पहले ही मुख्यमंत्री स्वामी नित्यानंन्द देहरादून शहर की एक सीट से चुनाव हर गए, और वह हार उनके राजनीतिक जीवन के लिए ऐसा बड़ा नुकसान करके गयी कि स्वामी फिर से राजनीति की मुख्यधारा में नहीं लौट सके। हालाँकि जब वह चुनाव हारे तब मुख्यमंत्री नहीं थे। उस समय भगत सिंह कोश्यारी राज्य के सीएम थे।

इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में तो और भी बड़ा राजनीतिक हादसा पेश आया। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में जीत के लिए खंडूड़ी को जरुरी बताया वो कोटद्वार विधानसभा सीट से चुनाव हार गए और पार्टी एक वोट से राज्य में सरकार बनाने से वंचित रह गयी। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में खंडूड़ी जीत तो गए लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में जब भी मुख्यमंत्रियों की हार का जिक्र होगा तब तब जनरल खंडूड़ी का नाम भी जुबां पर आएगा। इसके बाद 2017 के चुनाव में तो तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत हरिद्वार की हरिद्वार ग्रामीण और उधमसिंह नगर जिले की किच्छा विस सीट से ऐसे प्रतिद्वंदियों से चुनाव हार गए जिनकी उम्र हरीश के राजनीतिक तजुर्बे से भी कम थी। उत्तराखंड की राजनीति के लिए मुख्यमंत्रियों की हार बेहद गम्भीर मसला थी लेकिन लोग हर बार भूलकर आगे बढ़ते गए।

19 साल में नौ मुख्यमंत्री 

उत्तराखंड बनने के बाद 19 वर्षो में नौ मुख्यमंत्री मिले। स्वामी नित्यानंद, भगत सिंह कोश्यारी, नारायण दत्त तिवारी, जनरल बीसी खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, जनरल बीसी खंडूड़ी, विजय बहुगुणा, हरीश रावत के बाद अब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री है।

झारखण्ड : 

बतौर मुख्यमंत्री रघुवर दास के सामने आज उस तिलिस्म को तोड़ने की चुनौती है, जिसे पिछले 19 सालों में झारखंड का कोई पूर्व मुख्यमंत्री नहीं तोड़ सका। झारखंड में लोगों का भी मिजाज कुछ ऐसा रहा है कि जो नेता भी सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहा, उसे कभी न कभी चुनाव में जनता ने हार का स्वाद चखाया है. अब तक राज्य का कोई भूतपूर्व सीएम इस रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है. इसलिए रघुवर दास के सामने इस मिथक को तोड़ने की चुनौती थी।बता दें कि जब रघुवर दास सीएम नहीं थे तो 2014 में वे जमशेदपुर पूर्व सीट से लगभग 70 हजार वोटों से विधानसभा चुनाव जीते थे लेकिन अब चुनाव हार गए है।

‘गुरु जी’ ने तो ऐसी शिकस्त खाई…. 

झारखण्ड के सभी पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधू कोड़ा, हेमंत सोरेन विधानसभा चुनाव हारे हैं। लेकिन शिबू सोरेन जैसी हार किसी की नहीं हुई। 27 अगस्त 2008 को मधु कोड़ा ने सीएम पद से इस्तीफा तो तत्कालीन जेएमएम सुप्रीमो और गुरु जी के नाम से विख्यात शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उन्हें 6 महीने में विधानसभा का सदस्य बनना जरुरी था। मुख्यमंत्री रहते हुए शिबू सोरेन तमाड़ सीट से उप चुनाव में उतरे अपने प्रतिद्वंदी राजा पीटर ने 8,973 वोट से हरा दिया. राजा पीटर को जहां 34,127 मत मिला तो शिबू सोरेन को 25,154 मत से संतोष करना पड़ा। बस फिर क्या था, चुनाव हारने के बाद शिबू सोरेन को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा।

19 साल में 6 मुख्यमंत्री

झारखंड बने 19 साल गुजर चुके हैं. इस दौरान 3 बार विधानसभा चुनाव हुए और अस्थिरता के दौर से गुजरे झारखंड में 6 राजनेता मुख्यमंत्री बने. बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधू कोड़ा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास को झारखंड का सीएम बनने का सौभाग्य मिला है. इस बार चौथी बार झारखंड विधानसभा के लिए चुनाव हो रहा है। जब 15 नवंबर 2000 को झारखंड का गठन हुआ था तो उस समय अविभाजित बिहार के विधानसभा चुनाव में जीते सदस्यों के सहारे ही झारखंड की पहली विधानसभा का गठन हुआ था।

vojnetwork@gmail.com

No.1 Hindi News Portal

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button