Uttarakhand | गैरसैंण में 5 दिन का बजट सत्र: नियमों पर सियासी बहस तेज – Satya Voice

Uttarakhand | गैरसैंण में 5 दिन का बजट सत्र: नियमों पर सियासी बहस तेज

  • 5 दिन का बजट सत्र बना सियासी मुद्दा: नियमों के हवाले से कांग्रेस का सरकार पर हमला

देहरादून/गैरसैंण। उत्तराखंड में 9 से 13 मार्च तक प्रस्तावित विधानसभा का बजट सत्र एक बार फिर राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में आयोजित होने वाला यह सत्र केवल पांच दिन का निर्धारित किया गया है, जिस पर मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कड़ा एतराज जताया है।

कांग्रेस का कहना है कि वर्ष के पहले सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण, बजट प्रस्तुति और विभिन्न विभागों पर चर्चा जैसे अहम विषय शामिल होते हैं, ऐसे में पांच दिन का समय पर्याप्त नहीं है।

विपक्ष का तर्क है कि विधानसभा की ‘प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली, 2005’ के अनुसार लोकतांत्रिक विमर्श के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

नियम 20(3) के तहत राज्यपाल के अभिभाषण पर कम से कम चार दिन चर्चा का प्रावधान है, जबकि बजट पर सामान्य चर्चा नियम 175(1) के अनुसार प्रस्तुति के दो दिन बाद शुरू होकर कई दिन चलती है। ऐसे में कांग्रेस का कहना है कि निर्धारित समय-सीमा संसदीय परंपराओं की भावना के अनुरूप नहीं है।

कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन ने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक में सत्रों की अवधि लगातार घटती गई है, जिससे जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रीय मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।

उनका कहना है कि बजट सत्र कम से कम 15 दिन का होना चाहिए, ताकि सरकार की नीतियों और विभागीय खर्चों पर गंभीर बहस हो सके।

आंकड़े बता रहे सत्रों की घटती अवधि

विधानसभा के पिछले वर्षों के आंकड़े सत्रों की कम अवधि की ओर इशारा करते हैं। 2017 से 2022 के बीच कुल मिलाकर लगभग 55 दिन ही सदन की कार्यवाही चली।

वहीं 2022 से 2025 के बीच चार वर्षों में कुल 32 दिन ही सत्र आयोजित हुए। कई बार सत्र दो से छह दिन के भीतर ही समाप्त हो गए।

गैरसैंण को लेकर भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। 2014 से 2025 तक के 11 वर्षों में यहां कुल मिलाकर लगभग 35 दिन ही विधानसभा की कार्यवाही हो सकी।

राजनीतिक दल चुनाव के दौरान गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की बात करते हैं, लेकिन व्यवहार में सत्र सीमित दिनों तक ही सिमट जाते हैं। इससे पहाड़ की स्थायी राजधानी की मांग और जमीनी हकीकत के बीच अंतर साफ झलकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्ष भर में 60 दिन का सत्र संभव न हो, तो कम से कम 30 से 45 दिन की कार्यवाही आवश्यक है, ताकि प्रश्नकाल, शून्यकाल और विधेयकों पर समुचित चर्चा हो सके। सत्र छोटा होने से विधायी गुणवत्ता और जवाबदेही पर असर पड़ता है।

भाजपा का जवाब: ‘बिजनेस’ पर निर्भर अवधि

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के विधायक विनोद चमोली ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि सत्र की अवधि सदन के उपलब्ध विधायी कार्यों पर निर्भर करती है।

कार्य संचालन समिति में विधानसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और संसदीय कार्य मंत्री सहित दोनों पक्षों की सहमति से तिथियां तय की जाती हैं।

चमोली का तर्क है कि यदि विधेयकों और सरकारी कार्यों की सूची सीमित है, तो सत्र अनावश्यक रूप से लंबा करने का औचित्य नहीं बनता। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष यदि सत्र बढ़ाने की मांग कर रहा है, तो उसे भी गैरसैंण में पूरी अवधि तक सक्रिय भागीदारी दिखानी चाहिए।

फिलहाल 9 मार्च से शुरू होने वाला बजट सत्र राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच आयोजित होगा। देखना यह होगा कि पांच दिन के भीतर सरकार और विपक्ष किस तरह से राज्य के वित्तीय और नीतिगत मुद्दों पर सार्थक बहस को अंजाम देते हैं।

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