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ज्ञानवापी मामला: मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद को वक्फ की संपत्ति साबित करने के लिए 1937 के मुकदमे का हवाला दिया

नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस)। वाराणसी जिला अदालत 26 मई को ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर विवाद पर दीवानी मुकदमे की सुनवाई करेगी। मुस्लिम पक्ष ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 7, नियम 11 (गुण-दोष) के तहत हिंदू पक्षों द्वारा दीवानी मुकदमे के गुण-दोष (मेंटेनेबिलिटी) को चुनौती दी है।

जिला न्यायाधीश ने सुनवाई के क्रम को रेखांकित किया है – वह पहले उस क्रम को तय करेगा जिसमें अतिरिक्त दलीलों, आपत्तियों और ऐड-ऑन को लिया जाएगा।

अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद समिति का प्रतिनिधित्व कर रहे मोहम्मद तौहीद खान ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, मुकदमा कानून द्वारा वर्जित है और मेंटेनेबल नहीं है।

खान ने दीन मोहम्मद नामक एक व्यक्ति द्वारा दायर 1937 के मुकदमे का हवाला दिया, जहां यह तय किया गया था कि मस्जिद, आंगन और जिस जमीन पर मस्जिद मौजूद है, वह वक्फ की संपत्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जिन मुद्दों को सुलझा लिया गया है उन्हें दोबारा नहीं उठाया जाना चाहिए। मस्जिद प्रबंधन ने दावा किया है कि परिसर में देवी श्रृंगार गौरी और अन्य देवताओं की दैनिक पूजा के लिए अप्रतिबंधित पहुंच की मांग करने वाला दीवानी मुकदमा प्रार्थना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 का उल्लंघन करता है। हालांकि, हिंदू पक्षों ने तर्क दिया था कि सर्वेक्षण रिपोर्ट पर विचार किया जाना चाहिए।

वर्तमान दीवानी मुकदमा पांच वादी- राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक द्वारा दायर किया गया है, जिसमें मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी की पूजा करने और निरीक्षण करने के लिए स्थानीय आयुक्त की नियुक्ति की मांग की गई है।

इससे पहले न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि मुकदमे में शामिल मुद्दों की जटिलता और संवेदनशीलता को देखते हुए, सिविल जज (सीनियर डिवीजन, वाराणसी) के समक्ष वाद को उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा के एक वरिष्ठ और अनुभवी न्यायिक अधिकारी के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने सुनवाई के लिए सिविल जज, सीनियर डिवीजन के समक्ष लंबित मामले को जिला जज वाराणसी को ट्रांसफर करने का निर्देश दिया।

20 मई को, सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद में पूजा के अधिकार की मांग करने वाले हिंदू पक्षों द्वारा मुकदमे की कार्यवाही जिला न्यायाधीश को हस्तांतरित कर दी थी। इसके अलावा अदालत ने 17 मई के अंतरिम आदेश में शिवलिंग की सुरक्षा करने को कहा गया था, जिसे सर्वेक्षण के दौरान कथित तौर पर खोजा गया था।

इसके अलावा अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि शिवलिंग की सुरक्षा के साथ ही वुजुखाना (नमाज अदा करने से पहले हाथ-मुंह धोने की जगह) को सील कर दिया जाना चाहिए, मगर इस दौरान नवाज में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। अदालत ने वुजू के लिए अन्य विकल्प भी तलाशने को कहा था।

शीर्ष अदालत ने वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करने के लिए पार्टियों से परामर्श करने के लिए भी कहा कि वुजू के लिए उचित व्यवस्था हो।

–आईएएनएस

एकेके/एएनएम

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